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Showing posts from May, 2019

इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है,की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।

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इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है, की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है। वो रात तो मेरी करवटों में ही निकल गयी थी। और मेरी हालत ऐसी थी, की जैसे कोई चोर कोई बड़ा हाथ मारकर आये और चोरी का सामान बहुत महफूज़ जगह छुपा आया हो। बहरहाल यहाँ वह महफूज़ जगह मेरा दिल था, और मैं उस सिनेतारिका को अपनी आँखों में चुरा लाया था। अब ज़माना ही ऐसा था, अब पिच्चर हॉल भी कस्बे में था, अगर कभी शहर या कस्बे जाना हो तो मौका लग सकता था, वर्ना पिच्चर कहाँ नसीब हम गाँव वालों को। हम लोगों के लिए तो कभी कोई स्वांग मंडली आ गयी तो बहुत हुआ। और स्वांग मंडली में भी वही ले देकर कल्लू ही मिलता था, नायिकाओं का रोल करता हुआ। इसलिए जब भी पिच्चर देख कर आते के कई दिन, कई कई महीने उसकी छाप दिमाग पर छपी रहती। उठना अमीता अच्चन की तरह, खड़ा होना अमीता अच्चन की तरह, पानी पीना अमीता अच्चन की तरह, और लड़ाई करना अमीता अच्चन की तरह। अमीता अच्चन हमारा संघर्ष था, अमीता अच्चन हमारा नायक था। लेकिन अमीता अच्चन ही हमारी ज़ंज़ीर भी था। अमीता अच्चन ज़ंज़ीर इसलिये था, क्योंकि पिच्चर का नाम रखा था इस बार "शराबी...

परखनली : पुस्तक समीक्षा

मेरे दो लंगोटिया यार हैं कॉलेज टाइम के, आज़म और अकबर। यह दोनों हिंदुस्तानी हैं, जबकि मैं इंडियन हूँ। ऐसा फर्क इसलिए क्योंकि यह मध्यप्रदेश से आते हैं, और मैं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का वाशिंदा हूँ। यह फर्क सिर्फ भौगौलिक स्तर पर न होकर, मूल्यों, संस्कारों और व्यक्तिगत संघर्ष का भी है।  जहाँ हम अपने ऐरकंडिशन कमरों में बैठ कर न्यूज़ चैनल देख कर चिंता जताते हैं, वहीं यह भाईलोग बुंदेलखंड के पठार के इलाके में बहुत गाढ़ी ज़िन्दगी बसर करते आये हैं। और यही सब झलकता है, छलकता है, गमकता है, इन भाइयों के कहानी संग्रह "परखनली" में। बहुत बढ़िया लिखी गयी 10 कहानियां। कहानियां भी ऐसी जैसे आँखों के सामने ही घटित हो रहा है। कहानियां ऐसी की पढ़ के लगे कि इस पात्र को तो मैं मिल चुका हूँ। आज जो कहानी उठाई, वह है "वो एक आखिरी कमरा"। अब बात ज़रूरी यह है कि मैं कोई आलोचक तो हूँ नहीं, बहरहाल ऐसी बहुत सी कहानियाँ अपने इर्द गिर्द घटती देख चुका हूँ। हम लोग उस दौर के भारतीय हैं, जिन्होंने 9% की दर से GDP बढ़ते देखा है। गाँव को कस्बा और कस्बे को शहर में तब्दील होता देख है। तब्दीली हुई तरक्की...

श्रद्धांजलि: ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ( Brigadier Kuldeep Singh Chandpuri)

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श्रद्धांजलि: ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी  13 जून 1997, तो सरजी टाइम हो रहा होगा करीब दोपहर के ढाई बजे , वरुण शर्मा के बड़े भैया आज वरुण को कोचिंग से लेने आये थे। थोड़ी देर पहले ही सोमनाथ भारती सर की मैथमेटिक्स की क्लास छूटी थी। हमारी कोचिंग कालू सराय में थी,जो आजकल सर्वप्रिय विहार के नाम से ज़्यादा प्रसिद्ध हो गया है। तो जैसे ही क्लास खत्म करके बाहर निकले देखा सड़क पर बहुत ही गहमागहमी थी। मेन रोड पर निकल कर पता लगा कि पास ही उपहार सिनेमा हॉल में भीषण आग लग गयी है। तो वरुण के भैया ने वरुण को बैठा कर अपनी गाड़ी उपहार सिनेमा हॉल की तरफ दौड़ा दी। मुझे लगा कोई ट्रांसफार्मर उड़ा होगा। मामले को गंभीरता से न लेते हुए में 764 नंबर बस पकड़ कर नेहरू प्लेस फिर आगे ईस्ट ऑफ कैलाश अपने घर पर आ गया। घर पहुंच तो आजतक पर दीपक चौरसिया इत्तला दे रहे थे कि उपहार सिनेमा अग्निकांड भीषण रूप लेते हुए दर्जनों जान  लील चुका है।उस दिन फ़िल्म लगी थी "बॉर्डर"।  मेरा पहला रिएक्शन था "बॉर्डर"! यह कैसा नाम हुआ "बॉर्डर"?  बॉर्डर तो उन दिनों हमारे लिए सिर्फ बदरपुर बॉर्डर था, जहां के लि...

हवाईजहाज़ का खाना इतना बेस्वाद क्यों होता है। (Why the airlines food tastes so bland!)

हवाईजहाज़ का खाना इतना बेस्वाद क्यों होता है। लगभग इस विषय पर एक लेख पढ़ा था कहीं, तब जाकर मेरी दिमाग की बत्ती जली थी ..... की बंदा कह तो ठीक ही रहा है। तब अपने दिमाग के संदूकों से कुछ अनुभव बटोरते बटारते यह याद आया कि, मैं जब भी हवाजहाज़ में बैठा तो मेरा ध्यान खिड़की के बाहर ज़्यादा था, खाने में और खाना खिलाने वाली जनानियों में कम था। थोड़ा ग़ौर फ़रमाइये, मैंने अभी तक प्लेन या एयरक्राफ्ट जैसे पाश्चात्य शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। क्योंकि हमारी छत के ऊपर से "हवाईजहाज" ही जाता था, जिसे हम बच्चे लोग हाथ हिला कर, या फिर कभी कभी खुद पूरे हिल कर, टाटा करते थे। हम लोग 1980 वाले बच्चे हैं, हम लोगों में से बहुत से ऐसे आज भी है, जिनके लिए एयरपोर्ट एक तिलिस्मी दुनिया है। हालांकि कई लड़कों ने विलायत में ही बसर कर ली है, और वहीं अपनी रोटी पैदा कर रहे हैं, लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि, भारत का मतलब सिर्फ दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास नहीं है। तो यह दुनिया तिलिस्मी इसलिए है क्योंकि जिस आदमी से गली में कपड़े प्रेस करने वाली शकुंतला तक ठीक से बात नहीं करती, उसे एक अप्सरानुमा भद्रा नारी, आँ...