इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है,की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।
इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है, की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है। वो रात तो मेरी करवटों में ही निकल गयी थी। और मेरी हालत ऐसी थी, की जैसे कोई चोर कोई बड़ा हाथ मारकर आये और चोरी का सामान बहुत महफूज़ जगह छुपा आया हो। बहरहाल यहाँ वह महफूज़ जगह मेरा दिल था, और मैं उस सिनेतारिका को अपनी आँखों में चुरा लाया था। अब ज़माना ही ऐसा था, अब पिच्चर हॉल भी कस्बे में था, अगर कभी शहर या कस्बे जाना हो तो मौका लग सकता था, वर्ना पिच्चर कहाँ नसीब हम गाँव वालों को। हम लोगों के लिए तो कभी कोई स्वांग मंडली आ गयी तो बहुत हुआ। और स्वांग मंडली में भी वही ले देकर कल्लू ही मिलता था, नायिकाओं का रोल करता हुआ। इसलिए जब भी पिच्चर देख कर आते के कई दिन, कई कई महीने उसकी छाप दिमाग पर छपी रहती। उठना अमीता अच्चन की तरह, खड़ा होना अमीता अच्चन की तरह, पानी पीना अमीता अच्चन की तरह, और लड़ाई करना अमीता अच्चन की तरह। अमीता अच्चन हमारा संघर्ष था, अमीता अच्चन हमारा नायक था। लेकिन अमीता अच्चन ही हमारी ज़ंज़ीर भी था। अमीता अच्चन ज़ंज़ीर इसलिये था, क्योंकि पिच्चर का नाम रखा था इस बार "शराबी...