परखनली : पुस्तक समीक्षा
मेरे दो लंगोटिया यार हैं कॉलेज टाइम के, आज़म और अकबर। यह दोनों हिंदुस्तानी हैं, जबकि मैं इंडियन हूँ। ऐसा फर्क इसलिए क्योंकि यह मध्यप्रदेश से आते हैं, और मैं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का वाशिंदा हूँ। यह फर्क सिर्फ भौगौलिक स्तर पर न होकर, मूल्यों, संस्कारों और व्यक्तिगत संघर्ष का भी है।
जहाँ हम अपने ऐरकंडिशन कमरों में बैठ कर न्यूज़ चैनल देख कर चिंता जताते हैं, वहीं यह भाईलोग बुंदेलखंड के पठार के इलाके में बहुत गाढ़ी ज़िन्दगी बसर करते आये हैं।
और यही सब झलकता है, छलकता है, गमकता है, इन भाइयों के कहानी संग्रह "परखनली" में। बहुत बढ़िया लिखी गयी 10 कहानियां। कहानियां भी ऐसी जैसे आँखों के सामने ही घटित हो रहा है। कहानियां ऐसी की पढ़ के लगे कि इस पात्र को तो मैं मिल चुका हूँ।
आज जो कहानी उठाई, वह है "वो एक आखिरी कमरा"। अब बात ज़रूरी यह है कि मैं कोई आलोचक तो हूँ नहीं, बहरहाल ऐसी बहुत सी कहानियाँ अपने इर्द गिर्द घटती देख चुका हूँ।
हम लोग उस दौर के भारतीय हैं, जिन्होंने 9% की दर से GDP बढ़ते देखा है। गाँव को कस्बा और कस्बे को शहर में तब्दील होता देख है। तब्दीली हुई तरक्की हुई, घर में पंखे से कूलर आया, कूलर की जगह ले ली एसी ने। लेकिन सच्चे मायनों में यह तरक्की हुई हमारे बुज़ुर्गो की सेहत के मोल पर। जहाँ घरो में personal space की बात होने लगी, वहाँ घर के बड़े बुज़ुर्ग ,प्यारे दादा दादी, से ज़्यादा बोझ लगने लगे। घर के हर सदस्य को अपना कमरा चाहिए था, अपना मोबाइल चाहिए था, अपनी गाड़ी चाहिए थी। घर के बुजुर्गों को चाहिए था तो केवल परिवार।
इस कहानी में भी लेखक ने ऐसा ही कथानक प्रस्तुत किया है और एक बड़े कुनबे के सभी पक्षों को समेटने में सफल रहा है। इस कहानी में जो विधवा बुआ है, वो पहले मुहल्ले के हर दूसरे या तीसरे घर में मिल जाती थी। पूरी बस्ती में उस बुआ की बहुत इज़्ज़त होती थी, पूरी बस्ती ऐसी बुआ, ऐसी दीदी को अपनी बेटी जैसा लाड देती थी। लेकिन यह कहानी 2018 में लिखी गयी, जहां हर दूसरे घर में एक ऐसा इंजीनियर है, जिसने हाईवे के किसी प्राइवेट कॉलेज से B.tech किया है। मोटी फीस देकर पाई शिक्षा को जल्द से जल्द भुनाने के लिए तुरत फुरत ही बैंगलोर की किसी IT कंपनी की जॉब पकड़ना ही सपना है। अब ऐसे में इस पूरे सीन में बड़ी बुआ कहाँ फिट होती हैं?
ऐसा ही एक प्रश्न करती है यह कहानी "वो आखिरी कमरा"। इस कहानी में कुनबा बड़ा होते होते मकान छोटा पड़ने लगे जाता है। ध्यान दीजिए मैंने घर नहीं मकान लिखा है। घर तो उस दिन बिखरना शुरू ही जाता है, जब घर के चूल्हे अलग होने लग जाते है। और फिर चूल्हे अलग हो भी क्यों न, सांझे चूल्हों में अंगारे सिर्फ चूल्हों में ही नहीं, रोटी सेकने वालो के दिलो में भी दहक रहे होते हैं। बहरहाल बढ़ती महँगाई और घटती आय के इस दौर में परिवार के बीच ही प्राथमिकता की बात आ जाती है। और अंतिम प्राथमिकता हो जाती है घर के बुज़ुर्गो की। यह कहानी घर के सदस्यों के बीच चल रहे मानसिक द्वंद्व और व्यक्तिगत स्तर पर चल रहे मानसिक संघर्ष को बखूबी पेश करती है। यह कहानी एक बहुत बड़े पाठक वर्ग को संबोधित करती है, इस कहानी में कई परतें दिखती है। वयस्कों को संदेश है कि, आपके बच्चे आपसे वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा आप अपने बुज़ुर्गों से करते हैं। बुज़ुर्गों के लिए संदेश है, की जितना हो सके अपने हाथ पैर सक्षम रहते अपने बुढ़ापे की तैयारी करके रखें, अपना हाथ जगन्नाथ। मेरा ध्येय यहां कोई उपदेश देने का नहीं है, हर किसी की अपनी मजबूरियां होती है, वरना यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता। मेरा ध्येय अपने समाज की अवस्था और व्यवस्था को इस कहानी में ढूंढना है, और यह देखना की यह कहानी भविश्यम्भावी परिदृश्य के बारे में सोचने पर पाठक को किस तरह विवश करती है। लेखक इन दोनों ही पक्षों सफल रहा है।
यह कहानी एक बहुत खूबसूरत मोड़ पर खत्म कर दी जाती है, किसी नाटक के आखिरी अंक की तरह। दोनों लेखक भी बहुत मंझे हुए नाटककार भी है। और नाटक लिखने की कलाकारी उनके कहानी लेखन में बखूबी महकती है। दोनों भाइयों को यह सफल कहानी लिखने के लिए शुभकामनाएं।
क्रमशः
@विकास राजौरा
Comments
Post a Comment