श्रद्धांजलि: ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी ( Brigadier Kuldeep Singh Chandpuri)

श्रद्धांजलि: ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी 

13 जून 1997, तो सरजी टाइम हो रहा होगा करीब दोपहर के ढाई बजे , वरुण शर्मा के बड़े भैया आज वरुण को कोचिंग से लेने आये थे। थोड़ी देर पहले ही सोमनाथ भारती सर की मैथमेटिक्स की क्लास छूटी थी। हमारी कोचिंग कालू सराय में थी,जो आजकल सर्वप्रिय विहार के नाम से ज़्यादा प्रसिद्ध हो गया है। तो जैसे ही क्लास खत्म करके बाहर निकले देखा सड़क पर बहुत ही गहमागहमी थी। मेन रोड पर निकल कर पता लगा कि पास ही उपहार सिनेमा हॉल में भीषण आग लग गयी है। तो वरुण के भैया ने वरुण को बैठा कर अपनी गाड़ी उपहार सिनेमा हॉल की तरफ दौड़ा दी। मुझे लगा कोई ट्रांसफार्मर उड़ा होगा। मामले को गंभीरता से न लेते हुए में 764 नंबर बस पकड़ कर नेहरू प्लेस फिर आगे ईस्ट ऑफ कैलाश अपने घर पर आ गया। घर पहुंच तो आजतक पर दीपक चौरसिया इत्तला दे रहे थे कि उपहार सिनेमा अग्निकांड भीषण रूप लेते हुए दर्जनों जान  लील चुका है।उस दिन फ़िल्म लगी थी "बॉर्डर"। 
मेरा पहला रिएक्शन था "बॉर्डर"! यह कैसा नाम हुआ "बॉर्डर"?  बॉर्डर तो उन दिनों हमारे लिए सिर्फ बदरपुर बॉर्डर था, जहां के लिए 469 नंबर की फत्ते गोल्डन ब्लू लाइन चलती थी, जिसमे देशबंधु और पंत पॉलिटेक्निक का स्टाफ चलता था। बॉर्डर -दिल्ली का दूसरा कोना।

बहरहाल 11 सी में दाखिला हुआ, स्कूल शुरू हुआ।तब तक मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के डायलॉग बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर थे। अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह 1990-2000 वाले बच्चों के लिए "दीवार" जैसी कल्ट क्लासिक बन गयी थी। तब तक हमें पता चल चुका था कि लाहौर के मशहूर गुंडे का नाम गुलाम दस्तगीर है। हम यह भी जानते थे कि पाकिस्तान का प्लान में नाश्ता कहाँ होना है और रात का खाना कहाँ। सबको यह भी पता था कि मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी ने गुरनाम नामक सिपाही को बोला था "गुरनाम गल्ल पल्ले बंध लै"। वो गुरनाम ही था जिसने माता तनोटराय जी की खूब पूजा करी जिसके चलते तनोट माता ने भारत को यह जंग जितवाई।इस पिच्चर के चलते मुझे इस बात का पता चला था कि यह धरती सुनील शेट्टी की माँ है। मुझे इस बात में बिल्कुल भी शक नहीं रहा था कि मथुरा दास नाम के फौजी बहुत मतलबी होते हैं, जो जंग के दौरान छुट्टी लेकर सबको चिढ़ाते हुए घर चले जाते है। सच बोल रहा हूँ इंटरवल के पहले मैंने कसम खा ली थी कि मथुरादास नाम के किसी भी लड़के से दोस्ती नहीं करूंगा, मतलबी होते हैं साले।लेकिन इंटरवल के बाद जब मथुरादास अपने घर पहुंचने से पहले बीमार बीवी को मरता छोड़ अपने देश के खातिर अपने यूनिट वापस आ गया था, तो मैंने अपनी आंखों के कोरो में थोड़ी नमी सी महसूस करी थी। मुझे इस बात पर भी शुबहा है कि मैं मैकेनिकल इंजीनियर सुनील शेट्टी की LMG मैं रीकोइल स्प्रिंग खराब होने की वजह से बना था। Encyclopedia Brittanica में उसी हफ्ते LMG राइफल पर पूरा शोध कर डाला था। तब तक बॉर्डर हम सबके खून में मिल चुकी थी।अब कुछ नहीं हो सकता था। कई कई बार में श्रीनिवासपुरी के पोस्ट आफिस पूछ कर आ चुका था , कि NDA भर्ती के लिए पेपर के फॉर्म कब निकलेंगे। तब तक बाल भी मैंने फौजी कट रखने शुरू कर दिए थे। न कभी पेपर दिया न फौजी बने, बहरहाल यह बात फिरकभी।

लेकिन इसके बाद भी खुमारी का आलम यह था कि योगेंद्र सिंह सर के केमिस्ट्री लैब की अटेंडेंस में बोल  देते थे , रतन सिंह रिपोर्टिंग ऑन ड्यूटी साब। तब कोई न कोई लड़का बोल बैठता था , की रतन सिंह क्या सोचता है, दुश्मन सिर्फ एक टैंक लेकर आएगा, जो सिर्फ एक RCL गन से काम हो जाएगा। वो बात अलग है कि प्रैक्टिकल कॉपी में अगला एक्सपेरिमेंट नहीं किया होता था , फिर टीचर किसी पाकिस्तानी की तरह क्लास के बाहर खड़ा कर देती थी। लेकिन बाहर भी तो हम जोड़े से ही खड़े होते थे। साथ खड़े साथी के साथ भी बॉर्डर ही चल रहा होता था। 
वक़्त बदल साल बदला, Le chatelier principle, chromyl chloride test और integral calculus  से जूझते हुए अपनी नींव मज़बूत करने एक बार फिर से हम 12 सी में भर्ती हो गए। यहां भारत मिलाप हुआ कभी बकलोली के क्लासमेट रहे गगनदीप सिंह भाटिया से। गगनदीप को भी मेरी तरह एक ही रोग था "बॉर्डर" की दीवानगी। पहले ही दिन जब गगन ने बोला था "हम ही हम हैं तो क्या हम हैं" तो सच बता रहा हूँ बाएं गुर्दे के पीछे की तरफ कुछ हुआ था। ऐसा लगा शबरी को भगवान राम मिल गए।इस दिन के बाद 12वी क्लास दोहराने का दर्द थोड़ा कम हुआ। इसी क्लास में एक और लंगोटिया था अनुराग शर्मा।हमारी नज़दीकी कि यही वजह थी कि उसको पता था कि मेजर वीरभान के लड़के का नाम क्या था।अनुराग को पता था कि मेजर वीरभान के लड़के की एक माशूका थी कमला नाम की। बाद में मैंने ही अनुराग को याद दिलाया था कि मेजर वीरभान के लड़के की माशूका कमला का चेहरा पूजा भट्ट से मिलता था।इस बात का मुझे आज तक बिल्कुल भी घमंड नहीं है। 
गगनदीप तब तक "संदेसे आते है" गाना अपनी स्पेशल डायरी में नोट कर चुका था, और मुझे कई बार सुना चुका था।लेकिन आज भी यह अबूझ पहेली है कि वो गाना "ऐ गुज़रने वाली हवा बता" से क्यों शुरू करता था। गगनदीप से नजदीकियां और बढ़ी, जब लंच ब्रेक में बास्केटबॉल कोर्ट पर बैट-बॉल (क्रिकेट नहीं) खेलते हुए , आखिरी ओवर में बैटिंग करने जाते हुए गगन के मुंह से सुना था "आज नाश्ता हम उनका करेंगे"। मम्मी कसम अगली बॉल पे आउट होने से ठीक पहले तक गगनदीप की आंखों से अंगारे फूट रहे थे। अगले ओवर में जब गगनदीप को बॉल लाने को कोर्ट के साइडशेड के ऊपर चढ़ाया गया था, तो याद है दूर से अनुराग को गुलाम दस्तगीर का डायलाग बोलते सुना था "टूट पड़ो काफिरो पर, मारे गए तो गाज़ी कहलाओगे"। नीचे उतारते हुए किसी ने उंगली करदी थी। तब भी गगनदीप ज़मीन पर पड़ा हुआ ऐसा लग रहा था जैसे सुनील शेट्टी लैंडमाइन लेकर दुश्मन टैंक के नीचे आ गया हो। इसके बाद जब वो उठा था तो ऐसा ही लग रहा था कि कोई फौजी जंग जीत गया हो। लेकिन बॉर्डर तो बॉर्डर थी,  और रहेगी। यह वो ज़माना था, जब कारगिल सिर्फ एक एडवांस्ड बॉर्डर पोस्ट थी।यह वो ज़माना था, की कोई पूछे कि विक्रम बत्रा कौन है, तो हम अंदाज़ा लगा सकते थे कि लाजपत नगर या फिर राजौरी गार्डन में रहने वाला कोई पंजाबी लड़का होगा।लेकिन बॉर्डर तब भी बॉर्डर थी, आज भी बॉर्डर है। बोर्डर को विशिष्ट बनाता है कुलदीप सिंह चांदपुरी का जियाला अंदाज़। विशिष्टता है उस युद्ध की ललकार में जिससे प्रेरित होकर एक पूरी पीढ़ी फौज में जाने को तैयार हुई। शत शत नमन ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी।कोटिश नमन माँ भारती।
माँ तुझे सलाम।

(नोट: इस लेख के सभी पात्र काल्पनिकता से कोसो दूर हैं और पूरी तरह जीते जागते आधारकार्ड धारी ज़िंदा इंसान हैं। मेरे आदरणीय सरजी श्री सोमनाथ भारती, अभी दिल्ली सरकार में मालवीय नगर से एक विधायक हैं।श्री श्री गगनदीप सिंह एक सफल वैवाहिक जीवन का निर्वहन करते हुए , एक रेडियो जॉकी के रूप में देश को सेवाएं दे रहे है। श्री श्री श्री अनुराग शर्मा दिल्ली के एक बहुत बड़े जाने माने इंटीरियर डिज़ाइनर हैं।आप सभी के उज्ज्वल भविष्य के शुभकामनाएं.)



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