अवेलेबल- क्या
अवेलेबल नुसरत फतेह अली खान की आवाज़ और हल्की बारिश ने उस शाम को और भी नशीला कर दिया था। यमुना एक्सप्रेसवे पर कार दनदना कर दौड़ रही थी। दौड़ती कार के अंदर जाम पर जाम चल रहा थे। जश्न था आगरा की मीटिंग का सफल होना और एक बड़ा आर्डर हाथ में आना। लेकिन एक जश्न में ही, मुख़्तलिफ़ बंदों के रक़्स के वजूहात जुदा हो सकते हैं। यहां भी कुछ ऐसा ही था। गाड़ी में दो बंदे थे और दोनों एक अलग सुरूर में थे। अंकुर सयानी का मैनेजर था जो उसको इस मीटिंग के लिए अपने साथ आगरा ले गया था। कंपनी की गाड़ी मिल सकती थी इनके बावजूद सयानी के साथ लंबा वक्त बिताने के लिए अंकुर ने अपनी गाड़ी ड्राइव करना ज़्यादा ठीक समझा। नुसरत फतेह अली खां और शराब का नशा दोनों पर तारी था। इससे पहले की यह सुरूर उरूज पर पहुँचता, बाहर घनघोर घटा छा गयी। बारिश इतनी तेज़ हो गयी कि गाड़ी के शीशे से बाहर की सड़क दिखनी दूभर हो गयी। पूरा माहौल देख कर अंकुर मुस्कुराया और बगल की सीट पर सयानी को देखा जो आँखें बंद करके कोई गीत गुनगुना रही थी। सब कुछ प्लान के हिसाब से चल रहा था। अंकुर उस दिन का मौसम पहले ही इंटरनेट पर देख चुका था और उसको मालूम था कि वापसी...

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