गर्मी का तांडव



गर्मी का तांडव~ व्यंग्य की जुगलबंदी #१४२
अभी अभी डॉ लाल पैथ लैब को अपना रक्त दान करके आ रहा हूँ, और रास्ते भर क्या देखता हूँ, की चील अंडे दे रही है। चील का अंडे देना मेरी नानी के मुहावरों की लंबी फेहरिस्त में से एक था, जिसका प्रयोग वह जेठ के महीने में ही किया करती थी। सड़क का डाम्बर उखड़ने को हो रहा था, की टायर के साथ साथ तुम्हारे घर तक चलेंगे, और बगल में खड़ी काली हौंडा जैज़ आग उगल रही थी। घाम से दग्ध शरीर को कोई ठंडक नहीं मिल रही थी, तो मेरा मन पुरानी यादों की छाँव में जा बैठा।
आज ही पता चला कि मेरी यादों की नगरी में भी सेक्टर कटे हुए हैं, और गलियों और चौराहों के बाकायदा नाम भी हैं। बहरहाल मैं सीधे पहुँचा पिन कोड 110065 पर जहाँ कॉलोनी में सभी दो तल्ले मकान ही थे। मैं उसी मकान की छत पर खड़ा था, जो कि हमारी कॉलोनी में कभी सबसे ऊंचा था। कल्पना की उड़ान मुझे उड़ाते हुए ले आयी एक छत पर जहाँ खरहरी खाट पर सफेद चादर बिछी थी। बड़ा आनंद आ रहा था कि, किसी ने मुझे उठा दिया, कि वो तो ताऊजी की खाट है, मेरा बिछोना तो ज़मीन पर लगा है। ज़मीन से पानी के छिड़काव के बाद वाली महक आ रही थी। उस समय टाइम पास के लिए इंस्टाग्राम की फीड की जगह हम लोग टूटते तारों की स्पीड देखा करते थे। तभी देखा कि बगल की छत पर जैगम खाटों के साथ कुछ खुरपेची कर रहा था। एक बार देखा अनदेखा कर दिया लेकिन बहुत देर तक वो वहीं    खुर पेची करता रहा। तभी दूसरी छत पर एक दूसरी आदम आकृति प्रकट हुई। उन दिनों भूत पिशाच की कहानियों का बहुत चलन था। छत पर सोने से पहले भूतों की बातें करना हम बच्चे लोगों के शगल में शुमार था। तो किसी भूत को दृष्टिगोचर होने के आशंका से मैंने दूसरी छत पर अपनी आंखें गड़ा दी। लेकिन वह भूत नहीं भूतनी सी थी और रात को अपनी गीली तौलिया चांदनी में सुखाने आयी थी। इतने में जैगम की काम की स्पीड बढ़ गयी और अपनी खाट को वह बहुत आवाज़ करते हुए झाड़ने लगा। इस बीच मुझे कुछ पत्थर नुमा कुछ आकृति दो छतों के बीच चलते दिखाई दिए, और उन दोनों छतों के बीच एक मुस्कान का आदान प्रदान हुआ। इस तंद्रा से मेरा ध्यान तब टूटा जब छत पर सो रहे मेरे कुनबे में से किसी ने बदबू भरे गैस प्रक्षेपण अस्त्र की टेस्ट फ्लाइट का संधान कर दिया। पानी की सुराही सीढ़ियों के पास लकड़ी के स्टूल पर रखी थी।
जनाब यकीन जानिए, एक ज़माना था कि दिल्ली कि सर्दी के साथ साथ दिल्ली की गर्मी भी मशहूर थी। तब पान की दुकान पर लोग छोटी गोल्ड फ्लैक नहीं, अपने फॉर्मूले का गीली सुपारी वाला पान बनवाते थे, और कोई भी यह शिकायत नहीं करता था कि भाई इस साल गर्मी बहुत है। पानी पीने के बहाने जब छत की मुंडेर के नज़दीक खड़ा हुआ तो देखा हमारे आंगन के दूसरी तरफ कमरे में बत्ती जल रही थी। यह एक अप्रत्याशित घटना थी, तब याद आया कि विजय भैया का कोई पेपर है किसी कंपीटिशन परीक्षा का। लेकिन अपने को क्या, अपन तो गली में अपने सखाओं को ढूंढने में लगे थे। तो गली में झाँकने पर पता चला कि सिंधण आंटी अपने नए फोल्डिंग पलंग पर अपने घर के सामने बैठी है, थोड़ी दूर पर गोला अपने पापा की हाथ के पंखे से हवा कर रहा था। संजय, जिसे किसी दैवीय घटना के बाद लड़के "चीगली"बोलने लगे थे, वो चार लड़के इकठ्ठे करके उन्हें आज अखाड़े में लगाये अपने दाँव पेचों के बारे में बता रहा था। बाकी लड़के मुँह बाये उसकी बातें सुन रहे थे। दूर से यह प्रतीत होता था कि कुछ लड़कों ने उसको सुबह अखाड़े चलने की ज़बान दे दी थी, और बात पक्की करने के लिए ताली दे डाली थी। इस पूरे मंज़र का एक ही अर्थ था, कॉलोनी में आज भी फिर से लाइट गयी हुई थी।
अगले दिन जैगम को गली के बाहर नुक्कड़ की गन्ने की दुकान पर बहुत देर बैठा देखा गया था। जैगम वहां से तभी हटा था, जब वो दूसरी मानव आकृति, अरे वो चांदनी में गीली तौलिया सुखाने वाली, वहाँ आकर जैगम के हाथ से गन्ने का रस पी लिया था। गर्मी के दिनों में गन्ने के रस की दुकान और तरबूज़ के अड्डे सामूहिक केंद्र हुआ करते थे। अगर खाने में मिलावट की बात होती थी तो इस तर्ज़ पर की इस गन्ने के रस में नींबू कम डाला है और पुदीने का तो कोई स्वाद ही नहीं आ रहा। गन्ने के रस की दुकान से में आगे बढ़ा ही था वशिष्ठ मेडिकल स्टोर की तरफ की पीछे से एक हौंडा जैज़ हॉर्न मारने लगी।
उस ड्राइवर के लिए उसकी माँ और बहन के साथ रिश्तों को एक नए आयाम स्थापित करते हुए एक अपशब्द मेरे मुँह से निकल ही था कि मैं ठिठक गया। यह 1982 में हौंडा जैज़ कहाँ से आ गयी। हॉर्न की ध्वनि बढ़ती गयी तब मेरी तंद्रा टूटी, की यह 2019 है और मैं कड़कड़ी मोड़ पर खड़ा हूँ अपनी एक्टिवा पर।
हौंडा जैज़ को जगह देते हुए मैं स्कूटर थोड़ा आगे बढ़कर फ्लाईओवर की छाँव में ले आया। मोबाइल निकाला और फेसबुक पर उस चौक की एक तस्वीर के साथ प्रेषित कर दिया "feeling hot hot hot"। आज की गर्मी के लिए मैंने अपना रस्मी फ़र्ज़ निभा दिया था। अब मैं किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढने लगा जिसे पकड़ कर में कह सकूँ, "भाईसाहब बहुत गर्मी है, आप तो घर में बैठे मज़े ले रहे हो, बाहर बहुत गर्मी है"। लेकिन घर पहुंचने तक न एक बंदा मिला नया बंदे की ज़ात। एक बार को शक हुआ कि कहीं दोबारा से टेलीविज़न पर महाभारत तो नही  शुरू हो गया। तभी ध्यान आया कि जैगम तो कल ही मिल था मार्किट में बता रहा था कि कल घटोत्कच मरने वाला है, यूट्यूब पर।
इस बात का केवल एक ही अर्थ था, "भाईसाब गर्मी बहुत पड़ रही है इस साल, कोई रिकॉर्ड टूटेगा इस बार भी"  इतनी देर में देखता हूँ कि घर आ चुका है और ख़यालों की खरहरी खाट वाली छत से उतर कर स्प्लिट ऎसी वाले कमरे में जाने का वक़्त आ गया है। ऐसी चालू करने के बाद मैं सोच रहा था की अगर आज का वक़्त होता तो जैगम क्या करने छत पर जाता? शायद अपने टाटा स्काई की छतरी ठीक करने। खैर छोड़िए, भाईसाहब गर्मी बहुत पड़ रही है इस.........

मौलिक रचना @ विकास राजौरा



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