नराकास - वाद विवाद प्रतियोगिता
आज
दिनांक 13 जून 2019 को नगर राजभाषा कार्यान्वन समिति,
भारत सरकार, गृह मंत्रालय, के तत्वाधान में आयोजित वाद विवाद
प्रतियोगिता में अपनी कंपनी का प्रतिनिधित्व करते हुए अपना वक्तव्य रखा गया। यह एक
अंतर पब्लिक सेक्टर कारपोरेशन प्रतियोगिता थी, जिसमे NTPC, SAIL, BHEL, IOCL,
HPCL, BPCL, ONGC, BEL, TCIL, CWC इत्यादि
कम्पनियों के श्रेष्ठतम वक्ताओं ने भाग लिया। आज का मेरा वक्तव्य इस प्रकार है:
विषय:
कर्म हमेशा भाग्य से बड़ा होता है।
"वर्षों
तक वन में घूम घूम, बाधा
विघ्नों को चूम चूम, सह
धूप घाम पानी पत्थर, पांडव
आये कुछ और निखर"
मैं
विकास राजौरा, भेल
कॉर्पोरेट आफिस से, आज
नराकास के इस आयोजन पर राष्ट्रकवि दिनकर का आह्वाहन करता हूँ, और नमन करता हूँ आदरणीय निर्णायक मंडल
को और सभी साथी वक्ताओं को। मैं आज के विषय के पक्ष में बोलने जा रहा हूँ।
अपने
वक्तव्य का आरंभ मैंने रश्मिरथी के तृतीय संसर्ग से किया है, जहाँ पांडव महाभारत से युद्ध से पूर्व अपने
भाग्य और कर्म के लेखेजोखे की विवेचना कर रहे थे। संदर्भ आज भी प्रासंगिक है,
पांडव 14 वर्ष का वनवास काटकर अपने राज्य में
वापस आये थे। पांडवों को आशा थी कि तत्कालीन राष्ट्राध्यक्ष उन्हें सरकार बनाने का
निमंत्रण देंगे। लेकिन सरकार बनाने का एक प्रयास पहले ही विफल हो चुका था, जिसके चलते उनको वनवास भुगतना पड़ा था।
अगर पांडव इस परिस्थिति को भाग्य के भरोसे छोड़ते तो शायद आज उनका कोई नामलेवा न
होता। लेकिन अपने कर्म को पुरुषार्थ को अपने भाग्य से अधिक बलशाली मानकर पांडवों
ने वनवास को सहर्ष स्वीकारा था। इस वनवास के प्रयोग उन्होंने अपने राज्य में
विधायिकी स्तर, पंचायत
स्तर, निर्वाचन क्षेत्र में
काम करने पर और अपने कैडर के समर्थन को जुटाने में लगाया। ये सब परियोजना प्रबंधन
उस युद्ध के लिए था, जो
कि अवश्यम्भावी था। इस आधार पर ही में इस बात का पूर्णमेव समर्थन करता हूँ कि कर्म
हमेशा भाग्य से बड़ा होता है।
तो
महोदय में यहाँ बहुत ही सपाट और स्पष्ट बात रख रहा हूँ, साथी वक्ताओं की तरह में आसमान में
पत्थर मारकर सुराख करने की बात नहीं कर रहा, क्योंकि पर्यावरण दिवस हाल ही में निकल
है, उस सुराख की मरम्मत
N G T मुझसे ही करवाएगी।
मैं यहां बात नहीं करूंगा किसी सोते हुए शेर के मुँह में किसी हिरण के जाने की,
क्योंकि शेर जंगल का राजा है, वो जैसा चाहेगा वही होगा। अगर हिरण को
शेर के मुँह में स्वयं जाना है तो इसके लिए अध्यादेश जारी होगा और हिरण को जाना
पड़ेगा। मेरा तर्क सिर्फ इतना ही है कि यह धरा कभी वीरों से सूनी नहीं होती।
यह वर्ष 2019 है, अगर आप भाग्य के भरोसे बैठेंगे तो बाज़ी
मार जाएगा वो व्यक्ति जो आपसे ज़्यादा मेहनत मारने को तैयार है। उदाहरण हमारे सामने
हैं, अम्बानी, अडानी, अम्बेडकर और हमारे आज के
प्रधानमंत्रीजी। अगर यह महान लोग भाग्य के भरोसे बैठते तो आज उन ऊंचाइयों पर न
होते जो इन्होंने अर्जित करी हैं।
आज
सदन के विषय में ज़ोर रहेगा भाग्य पर, वही भाग्य, जिसे
कभी मस्तक पर चमकता बताया जाता है, कभी
हाथ की लकीरों में कभी आपकी कुंडली के नौंवें घर में। लेकिन यह भी शाश्वत सत्य है
कि लकीरों भरे उस हाथ से अगर पुरुषार्थ नहीं किया और सुबह 9 बजे काम पर नहीं निकले तो कुछ भी नहीं
अर्जित होने वाला। मनुष्य के हाथ में केवल कर्म है, और फल की चिंता करना ही व्यर्थ है। इस
कर्म और पुरुषार्थ के बल पर ही मानवता आज वहाँ पहुँच गयी है जो कभी केवल
बुद्धिजीवियों की कल्पनाओं में था। सरल शब्दों में बात यह है कि कर्म चेतन है,
और भाग्य जड़। कर्म जब आप पूरा कर लेंगे
तभी भाग्य की बात आती है। चेतन कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। आपका कर्म ही
आपके पांडव या कौरव बनने का अंतर निर्धारित करता है।
मेरे
मत में भाग्य का सहारा तब लिया जाता है, जब आपका कोई निर्णय गलत सिद्ध हो जाये और आपके अंदर इस गलती की
ज़िम्मेदारी उठाने का साहस न हो। ध्यान रखिये, आपका उपहास भी वही लोग उड़ाते हैं जो
स्वयं अपने निर्णय की ज़िम्मेदारी उठाने में झिझकते हैं। इस जगह तर्क आ सकता है कि
अगर भाग्य साथ दे तो गलत निर्णय भी सही फल दे जाता है,तो इसपर मेरा कहना है,
फैसला
होने से पहले में भला क्यों हार मानूँ, जग अभी जीता नहीं है और मैं अभी हारा नहीं हूँ।
अगर
आप अपनी विफलताओं को नकारने की क्षमता रखते हैं तो आपकी कभी हार नहीं होती। भाग्य
को भी थक कर आपके सामने झुकना पड़ता ही है। आपको क्षमता पैदा करनी पड़ेगी की आप अपने
अनुशासन से और एकाग्रचित्त होकर अवलोकन करें कि असफल हुए क्यों। यहां भाग्य का काम
ज़्यादा नहीं है, हो
सकता है कि आप एक ज़ोरदार निशानेबाज़ हैं लेकिन आप 100 मीटर की दौड़ में भाग ले रहे हैं। यह भी
आपका कर्म ही निर्धारण करेगा कि किस तरह और कितना आपको अपना मार्ग बदलना है।जो
भाग्य का रोना रोते हैं, उनको
ज्ञात हो कि दुर्योधन और अर्जुन, दोनों
के गुरु एक ही थे। कर्मक्षेत्र में स्वयं की समझदारी भी ज़रूरी है, मौके सबको बराबर मिलते हैं, यह आप पर निर्भर करता है कि आपको घाट
बनना है या अविरल धारा। कहते हैं-
समंदर
को बांधे ऐसा कोई घाट नहीं,
कदमों
को रोके ऐसी कोई बाट नहीं,
बात
बाटति रह जाती रही मंज़िल पहुंच जाती है
घाट
घटते रह जाते धारा समुद्र में मिल जाती है।
अपनी
वाणी को विराम देने से पहले में अपनी बात पुरज़ोर तरीके से फिर कहना चाहता हूँ कि
कर्म हमेशा भाग्य से बड़ा होता है। हमारा पुरुषार्थ ही हमारा वर्तमान बनाता है और
उज्ज्वल वर्तमान से उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है। इस पर दिनकर जी फिर स्मरण
हो आते हैं कि-
मेहँदी
सहती जब प्रहार, ललनाओं
का बनती तब सिंगार,
जब
फूल पिरोये जाते है, हम
उनको गले लगाते हैं,
पीसा
जाता जब इक्षु दंड, झरती
रस की धारा प्रचंड।
मौलिक रचना @ विकास राजौरा
Comments
Post a Comment