हवाईजहाज़ का खाना इतना बेस्वाद क्यों होता है। (Why the airlines food tastes so bland!)

हवाईजहाज़ का खाना इतना बेस्वाद क्यों होता है।

लगभग इस विषय पर एक लेख पढ़ा था कहीं, तब जाकर मेरी दिमाग की बत्ती जली थी ..... की बंदा कह तो ठीक ही रहा है। तब अपने दिमाग के संदूकों से कुछ अनुभव बटोरते बटारते यह याद आया कि, मैं जब भी हवाजहाज़ में बैठा तो मेरा ध्यान खिड़की के बाहर ज़्यादा था, खाने में और खाना खिलाने वाली जनानियों में कम था। थोड़ा ग़ौर फ़रमाइये, मैंने अभी तक प्लेन या एयरक्राफ्ट जैसे पाश्चात्य शब्दों का प्रयोग नहीं किया है। क्योंकि हमारी छत के ऊपर से "हवाईजहाज" ही जाता था, जिसे हम बच्चे लोग हाथ हिला कर, या फिर कभी कभी खुद पूरे हिल कर, टाटा करते थे। हम लोग 1980 वाले बच्चे हैं, हम लोगों में से बहुत से ऐसे आज भी है, जिनके लिए एयरपोर्ट एक तिलिस्मी दुनिया है। हालांकि कई लड़कों ने विलायत में ही बसर कर ली है, और वहीं अपनी रोटी पैदा कर रहे हैं, लेकिन फिर भी मेरा मानना है कि, भारत का मतलब सिर्फ दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, मद्रास नहीं है। तो यह दुनिया तिलिस्मी इसलिए है क्योंकि जिस आदमी से गली में कपड़े प्रेस करने वाली शकुंतला तक ठीक से बात नहीं करती, उसे एक अप्सरानुमा भद्रा नारी, आँखों में आँखें डाल कर पूछती है ...... "कहाँ रह गए थे आप"। अब ऐसे में गली के जैगम को कहां ध्यान रहेगा खाने के स्वाद का!

मेरी हवाई यात्राएँ तकरीबन हर दो महीने के अन्तराल पर होती रहती हैं, लेकिन आज भी, कई सालों बाद मैं हवाईअड्डे पर वही रेलवे प्लेटफार्म वाला सुकून ढूंढता हूँ। आप पूछेंगे की मसला क्या है, अब मसला एक हो तो बताएँ। सुबह सुबह की फ्लाइट होती है छह बजे की, तो फिर एक बारहवी के विद्यार्थी की तरह सुबह चार बजे घर त्यागना पड़ता है। सुबह चार बजे घर से निकलने का मतलब सुबह तीन बजे .....मतलब रात 3 बजे उठना। चलिए पाँच बजे हवाईअड्डे पहुँच भी गए उसके बाद सिक्योरिटी चेक की लाइन में लग जाये। बाय गॉड ऐसी फीलिंग आती है जैसे किसी भंडारे में खाने की लाइन में खाली पन्नियाँ लेकर खड़े हो। और इस पूरे सोने पर सुहागा तब हो जाता है, जब कोई एक पूरा परिवार आपके आगे खड़ा हो गया है। उन लोगों को एकदम आखिर में याद आता है कि घर के सबसे छोटे सदस्य का आधार कार्ड उस बैग में है, जो कि सबसे पहले जमा करवा दिया गया था। अब आप थक कर दूसरे काउंटर की तरफ बढ़ते है। तो भाईसाब आपके पहुँचने से ठीक पहले काउंटर पर बैठे उस अधिकारी को अपने पेट के दक्षिण दिशा में उच्च दाब का क्षेत्र सा प्रतीत होता है, और वह काउंटर छोड़ उठ जाता है। अब एयरलाइन्स के दूसरे अधिकारी, जिनका काम केवल एक काउंटर से दूसरे काउंटर घूमना है, वह आपको खालिस अंग्रेज़ी में समझायेंगे की आप प्रतीक्षा करिये। यहाँ मसला यह हो जाता है, कि एक तो हम रात भर फौजी की तरह सोये, अलार्म क्लॉक को किसी लाडले बच्चे की तरह छाती से चिपकाए, आधे जागे- आधे सोये, हवाईअड्डे की कतार में खड़े हैं, और कोई सज्जन आपसे अमेरिकन लहजे की अंग्रेज़ी में, प्रतीक्षा करने को कहे तो आप क्या करेंगे। खून तो खौल उठता है, लेकिन मसला अंतर्राष्ट्रीय हो जाता है। अंग्रेज़ी अंतरराष्ट्रीय भाषा है, और हम भारतीयों पर अंग्रेज़ों और अंग्रेज़ी का बहुत गहरा प्रभाव(आघात) रहा है। अगर कोई अंग्रेज़ी में बोलेगा तो सबसे पहला काम रहता है, की हमारा दिमाग चौकन्ना हो जाता है। दिमाग में जो सबसे छवि बनती है वो है आठवीं क्लास वाली अंग्रेज़ी पढ़ाने वाली मैडम की। इसके बाद शिष्टाचारपूर्वज स्वतः ही आपके चेहरे पर सौम्यता से भरपूर मुस्कान आ जाती है। अब जब आप मुस्कुरा रहे हैं तो कैसे अपने रोष प्रकट करेंगे? अगर उन सज्जन ने अपनी मादरी ज़बान हिंदवी में कहा होता "भाईसाहब रुकावट के लिए खेद है", तो हम भी उनसे एकदम सहज होकर बात करते, और पूछते "यहाँ कोई कायदा कानून है कि नहीं, आप अपने अधिकारी को बुलाइये, आपकी शिकायत पुस्तिका कहाँ है, आप पहले अपना पूरा नाम बताइये"। इस पूरी खातिरदारी के बीच यह भी बता दिया जाता कि मेरा एक दूर का भाई भी आई ए एस अधिकारी है। लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि उस भद्र पुरुष ने अंग्रेज़ी में बोल दिया था "sir kindly bear with us, please wait for a minute"। अब ऐसे में जब आपके होंठों पर सौम्य मुस्कान तैर रही है, तो आप केवल मीठी मुस्कान से आभार प्रकट कर सकते है। लेकिन आप इस पूरे प्रकरण में दूसरी लाइन की गति पर किसी मुख्य चुनाव आयुक्त की भांति नज़र बनाये रखते है। अपनी वाक्पटुता और चतुराई पर तब गर्व होता है, जब आप देखते है कि बगल वाली लाइन में पूरा पाकिस्तान बना हुआ है और पूरा कुनबा मिल कर भी छोटे का आधार कार्ड नहीं ढूंढ पा रहे।
इस पूरे कर्मकांड से निजात पाकर आप बढ़ते है आगे सी आई एस एफ के जवान आपका इंतेज़ार कर रहे होते है। इन जवानों को दुआ सलाम करके आप आगे बढ़ते हैं, तो एक अलग ही दुनिया है। 
आपको जान कर चमचमाती झक्क सफेद दूधिया रोशनी में नहाई दूकानों के बीच से गुज़र कर वेटिंग एरिया तक जाना होता है। इन दुकानों पर जो सामान होता है, होता तो बहुत अच्छा है, लेकिन आप अपने होठों में बुदबुदाते हैं, की इस सामान को खरीदता कौन होगा? तीन तीन हज़ार के उस्तरे, पंद्रह सौ की कमर पेटी। लेकिन आप फिर भी विंडो शॉपिंग करते करते अपना खुद का आंकलन कर रहे होते हैं। दिमाग में एक कैलकुलेटर चल रहा होता है, जिसमें आप अपने पहने हुए परिधानों के मूल्य का गुणा भाग कर रहे होते हैं। अब ऐसे में गली के जैगम को कहां ध्यान रहेगा खाने के स्वाद का!

यहाँ से आगे गोलाई लेते हुए बड़े से बरामदे के बायीं तरफ होती है एक दुकान, सामाजिक बुराई की दुकान। इस दुकान की रौनक तो कुछ और ही होती है। यहाँ पर बड़ा सा बोर्ड लगा होता है, कुछ टैक्स और ड्यूटी की बात होती है। लिखा होता है ड्यूटी फ्री। आपकी रुचि इस दुकान पर बहुत बढ़ जाती है, क्योंकि बाकी दुकानों की अपेक्षा यहाँ सबसे ज़्यादा भीड़ होती है। नज़दीक जाने पर आपको समझ आता है, की यहाँ भी मामला अपनी जेब के बाहर का है। थोड़ा आगे बढ़ते ही आपको एक बुद्धत्व से प्रतीत होता है। अब आप एक किताबों की दुकान के सामने खड़े हैं। इस दुकान में कई ऐनक लगाए लेखक फर्मे के लोग दिखाई देते हैं।अब यहां भी मामला अंग्रेज़ी में चल रहा होता है। आप जब किताबों के बीच चेतन भगत की किताब ढूंढ रहे होते है, तभी यह लेखकनुमा भाईसाहब दुकानदार से ऐसी किताब की डिमांड करते हैं, जिसका आपने नाम भी नहीं सुना कभी। दूसरा झटका लगता है, जब दुकानदार की आवाज़ आपके कानों से टकराती है, जब वह उन लेखक महाशय को बताता है, की साहब वह किताब तो बेस्टसेलर है, टोटल आउट ऑफ स्टॉक।तब आप दोबारा अपना आँकलन करते है, और याद आता है, कि पिछली किताब जो आपने पूरे चाव से पढ़ी थी वह थी, कक्षा सात की "किशोर भारती"। एक बार फिर ज़लालत की एक छोटी से कैप्सूल लेकर आप आगे बढ़ जाते हैं। अब ऐसे में गली के जैगम को कहां ध्यान रहेगा खाने के स्वाद का!

इस पूरे सफर में आपका पेट suffer कर रहा होता है। इसकी वजह होती है , फ़ूड कोर्ट से उड़ती हुई खुशबू। आगे बढ़ने पर आपको सूचित होता है, की एक समोसा चालीस रुपये का है। आपको तब याद आता है पार्क के पास वाले सिंधी के ताज़े समोसे। जिसका अधिकतम खुदरा मूल्य दस रुपये है, और सीधे कढ़ाई से उतरते गर्मा गरम।सुबह तीन बजे उठने के कारण आपको हल्का भूख का एहसास तो हो रहा है, लेकिन मन लगा होता है प्रभु सुमिरन में। प्रभु सुमिरन क्योंकि आप आज सुबह खुल कर नहीं निबट पाए। आपको रह रह कर आपके उदर से  मिस कॉल आ रही है। ऐसे में आपको समझ नहीं आ रहा कि पहले खाएं की निबटाएँ। इसी उधेड़ बुन में आप प्रसाधन कक्ष की तरफ बढ़ते हैं तो एक और राष्ट्रीय समस्या आ घेरती है। मैं निबटने चला तो जाऊं, लेकिन सामान किसके पास छोड़ें। आस पास कोई भी अपरोचेबल नहीं लगता। जो थोड़ा बहुत आपकी तरफ देख रहा है, उसने कानों पर बड़े से लाउडस्पीकरनुमा इयरफोन हैं। यहां पर आप अपने अरमान दबाये वापस अपनी सीट पर आ बैठते है। खाने और निबटाने की जद्दोजहद के बीच आपको याद आती है पूड़ी-अचार की, जो आपकी मम्मी ने लड़ झगड़ कर बैग में रखवाई थी। लेकिन यहां फिर आप सोचने लगते हैं, यहां एल्युमीनियम फॉयल में लिपटी हुई पूड़ी खोली तो कोई क्या सोचेगा (पचास की उम्र पार करने पर समझ आता है, घंटा किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता)। बहरहाल इस खाने और निबटाने की पसोपेश में हवाईअड्डे के पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम पर आपकी फ्लाइट की घोषणा हो जाती है। अब आप ही बताइए, अब ऐसे में गली के जैगम को कहां ध्यान रहेगा खाने के स्वाद का!

अब जैसे तैसे आप पच्चीस दरवाज़े पार करके पहुँचते हैं अपनी सीट पर। मन फिर लग जाता है प्रभु सुमिरन में। एक सच्चे भारतीय की भाँति आप दुआ कर रहे होते हैं कि कोई एक बॉलीवुड अभिनेत्री आपकी बगल की सीट पर बैठ जाये। इस कल्पना को आप यह सोच कर पूरा करते हैं, की वह आपसे पूरे रास्ते बात करती जाए और जाते जाते आप दोनों में मोबाइल नंबर का भी आदान प्रदान हो जाये। लेकिन, होय वही जो राम रची राखा। आपकी बगल में आ बैठता है, चांदनी चौक का लौंग-इलाइची का एक बड़ा आढ़ती। वह आपसे बात तो करना चाहता है, लेकिन अब आप स्वयं को भद्र पुरुष दिखाने की होड़ में लग जाते है। यहां तक कि सीट की जेब में रखी इश्तहारी पत्रिका के सभी पन्ने पढ़ जाते है। इस दौरान विमान परिचायिका आपको सीट पेटी बंधने का एक छोटा सा शो दिखाती है। आप कौतूहलवश उस लड़की को देख रहे होते हैं, की इसको देख कर मुझे हँसी आ रही है, इसने अपनी हँसी कैसे रोक रखी है। लेकिन काम तो काम है। इन लड़के लड़कियों के लिए मेरे मन में बहुत आदर है। प्लेन के हवा में आते आते आप हल्के नींद के आगोश में आ चुके होते है। ऐसे में आधी नींद में आपको कोई भी कुछ खाने को देगा तो आपको क्या स्वाद आएगा। अब बताइये, अब ऐसे में गली के जैगम को कहां ध्यान रहेगा खाने के स्वाद का!

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