इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है,की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।


इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हे पाने की कोशिश की है,
की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है।
वो रात तो मेरी करवटों में ही निकल गयी थी। और मेरी हालत ऐसी थी, की जैसे कोई चोर कोई बड़ा हाथ मारकर आये और चोरी का सामान बहुत महफूज़ जगह छुपा आया हो। बहरहाल यहाँ वह महफूज़ जगह मेरा दिल था, और मैं उस सिनेतारिका को अपनी आँखों में चुरा लाया था। अब ज़माना ही ऐसा था, अब पिच्चर हॉल भी कस्बे में था, अगर कभी शहर या कस्बे जाना हो तो मौका लग सकता था, वर्ना पिच्चर कहाँ नसीब हम गाँव वालों को। हम लोगों के लिए तो कभी कोई स्वांग मंडली आ गयी तो बहुत हुआ। और स्वांग मंडली में भी वही ले देकर कल्लू ही मिलता था, नायिकाओं का रोल करता हुआ। इसलिए जब भी पिच्चर देख कर आते के कई दिन, कई कई महीने उसकी छाप दिमाग पर छपी रहती। उठना अमीता अच्चन की तरह, खड़ा होना अमीता अच्चन की तरह, पानी पीना अमीता अच्चन की तरह, और लड़ाई करना अमीता अच्चन की तरह। अमीता अच्चन हमारा संघर्ष था, अमीता अच्चन हमारा नायक था। लेकिन अमीता अच्चन ही हमारी ज़ंज़ीर भी था।
अमीता अच्चन ज़ंज़ीर इसलिये था, क्योंकि पिच्चर का नाम रखा था इस बार "शराबी"। और हमारा पूरा परिवार इस सामाजिक बुराई के खिलाफ था। गाँव में एक दो लड़के थे, लफंगे से, वो देख आये थे यह पिच्चर। और पूरे दिन उसके गाने गाते फिरते थे।सब गाँव वाले उन्हें हिकारत की नज़र से देखते थे। लेकिन जब से जैगम ने मुझे बताया था कि इस पिच्चर में नई हीरोइन है, एकदम फसक्लास, तबसे मेरे अरमान हिलोरे मारने लगे थे।
अब आप पूछेंगे जैगम कौन, यह वही जैगम है, जिसका बाप गाँव में आध बटाई पे खेती करता था, और लड़का निकल गया आवारा। कुछ काम धाम नहीं, और चार लड़के अपने साथ और लगाए रखता था। और तो और एक बार शहर क्या गया, वहां से बाल भी सेट करवा आया, वो भी हीरो कट में। इस जैगम से गाँव की कोई लड़की बात नहीं करती थी। लेकिन मुझसे थोड़ी बहुत पटती थी जैगम की।उसकी वजह यह कि जब कोई नई पिच्चर देख कर आता मुझे आकर कहानी सुनाता। और कहानी क्या सुनता पूरा का पूरा फाइट सीन करके दिखता था।
अब मैंने भी ठान ली थी, यह पिच्चर तो देखनी ही देखनी है। लड़के, झगड़के, जहर खाकर, घरवालों से लड़कर, देखनी है तो देखनी है। और देखें भी क्यों नहीं, जैगम ने बताया था, इस नई हीरोइन, जिसका नाम भी अजीब सा था, नाचती बड़े गजब का है। नाम भी अजीब सा था ....... अरे याद नहीं आ रहा..... जया...... हाँ याद आया "जया परदा"। बड़ी हँसी आयी मुझे यह कैसा पर्दे वाला नाम है। लेकिन जैगम ने इतने तारीफ़ों के पुल बांध दिए थे, कि अब तो देखना ही पड़ेगा, "जय परदा"को।
तो भैया करके जतन हज़ार, हम भी पहुँच गए शहर में टॉकीज उपहार। पिच्चर शुरू हुई और दिखाया कि अपना अमीता अच्चन ही शराबी था। बेचारा बचपन से ही शराब पीने लगा। उसका बाप बड़ा नालायक था, बच्चे पे ध्यान नहीं, दिन रात पैसा पैसा। इससे बढ़िया तो हम गाँव वाले हैं। एक डोकरा था मुंशीजी वो ही उसका ध्यान रखता था। आगे पिच्चर में आई, जय परदा। ऐसी जोरदार हीरोइन के हाथ लगते मैली हो, और नाम भी ऐसा ही "मीना"। लेकिन बड़ी मजबूरी में थी, उसका बाप था बेचारा अंधा। यह वही अंधा था, जो शोले में रहीम चाचा था। शोले में पूछता था," इतना सन्नाटा क्यों है भाई", यहाँ पूछता रहता था, "आ गयी बेटी मीना"। मीना को देख कर मुझे बहुत तकलीफ हुई, घर चलाने को नाच कर पैसे कमाती थी। यकीन जानो पूरी पिच्चर में उसका दुख साझा किया था मैंने रो रो कर। आज भी याद है वो तारीख, 18 मई 1984। जितना इस दिन रोया कभी नहीं रोया था। मेरा मन किया कि कह दूँ, मीना मेरे पास काम लायक खेती है, छोड़ दो यह नाचना गाना।
लेकिन इस देश में किसान और जवान की सुनता कौन है? पिच्चर में गाना आया, "मुझे नौलखा मंगा दे रे, ओ सैयां दीवाने", भाईसाहब तबियत ही गयी एकदम गच्च। दिल में फूटने लगे लड्डू , अब मुझे चाहिए तो बस जय परदा ही। पिच्चर आगे बढ़ी तो पता लगा मुझे की अमीता अच्चन का दिया हुई नौ लाख का हार चोरी हो गया। मेरा हलक सूख गया, इतने पैसे तो मैंने ज़िन्दगी में नहीं देखे थे।उस दिन गांठ बांध ली थी, बेशक चार हल चलाने पड़े , अब नौ लाख रुपये जमा करके रहूँगा, अपनी मीना के लिए। लेकिन उम्मीदों पर पानी फिर गया जब अमीता अच्चन ने एक और हार दे दिया। लेकिन दिल में फाँस लग गयी थी, हार तो मैं लाख का ही दूंगा, चाहे चूड़ी वाली लाख का ही क्यों न हो।पिच्चर खत्म होते होते अमीता अच्चन और जय परदा मिल गए। पिच्चर खत्म लेकिन पैसा नहीं हजम।
हमारी पिच्चर तो इसके बाद शुरू होती है। तो भैया एक तो देखने गए पिच्चर, वो भी जैगम के साथ ऊपर से बिना बताए घर पे। भाईसाहब उस दिन पता लगा भगवान शंकर को गले में ज़हर रख कर कैसा लगता होगा। मेरे गले में भी फँसा हुआ था, ज़हर नहीं फिल्मी गाना। गाना गुनगुना नहीं सकते, किसी को सुना नहीं सकते, जय परदा ने जो दिल का हाल किया दिखा नहीं सकता। वो तो सुबह सुबह जंगल फिरने जाते तब दो चार बार गुनगुना लेते तो बहुत हो जाता। अब तो उठते बैठते, सोते जागते बस जय परदा। उस दिन मेरा हँस रोया था और विधाता को कस के गाली दी थी कि क्यों मुझे साधारण किसान बनाया। क्यों हम मिट्टी में पैदा हो कर मिट्टी में मिल जाते है, बिना कुछ करे धरे। जब जय परदा नहीं मिल सकती तो इस ज़िन्दगी का फायदा क्या।
लेकिन मेरे घरवाले शायद कुछ भाँप गए, और चर्चा शुरू करदी मेरी शादी की। यकीन जानिए पूरे 3 साल सिलसिला चला लड़की देखने का। घर वाले परेशान की हमें कोई लड़की पसंद नहीं आती। हम भी अड़े हुए, लड़की होनी चाहिए एकदम गोरी गट्ट, और नाम होना चाहिए जय परदा। अब गाँव देहात में मिले तो लाजवंती, चम्पा, मोहरा, छाजी, रामकटोरी और गुल्लो, गाँव में कहाँ से आये जय परदा? किसी तरह जीजा फूफा के समझाने पर मैं राज़ी हुआ एक रिश्ते पर, क्योंकि लड़की का नाम मीना था।
तो बेला का फूल, चम्पा की कली, यहाँ से कहानी आगे को चली। फिर ......फिर क्या गृहस्थी शुरू, बच्चे कच्चे, घर खलिहान, वक़्त बीतता गया। लेकिन दिन में एक बार सच्चे दिल से याद कर लेता था अपनी जय परदा को। बालों में सफेदी आ गई, लेकिन दिल के अरमान सुर्ख रहे। वैराग ऐसा की शराबी के बाद कोई पिच्चर, कोई टेलीविज़न, कोई मोबाइल, कोई खबर नहीं देखी। लेकिन किसी ने कहा है, की सच्चे दिल से कुछ माँग लो तो पूरी कायनात लग जाती है, तुम्हे उससे मिलवाने के लिए। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
वो भी मई था यह भी मई है। वो साल था 1984, यह साल है 2019। मैं तो दोपहर के बाद खेतों की तरफ होने को जा रहा था, तब देखा कि जैगम का लड़का मेरी तरफ आया और बोला चाचा जाना मत, खेत पे रहना। यह जैगम का लड़का भी जैगम के नक्शे कदम पे था, खूब दिखता था चुनाव के मौसम में, बाकी टाइम ,के तुम कौन, के मैं कौन। मैंने पूछा क्यों, तो उसने बताया हमारे क्षेत्र के लोकसभा प्रत्याशी आने वाले हैं। मैंने सोचा चलो थोड़ा तमाशा देख लेंगे।
इसके बाद क्या हुआ आप यकीन नहीं करेंगे, वो तो मेरा कुछ दान पुण्य आड़े आ गया कि मैं ज़िंदा हूँ आपको कहानी सुनाने को, वर्ना आम आदमी के बस की बात नहीं है। एक गाड़ी मेरे खेत के पास आकर रुकी, और मैं क्या देखता हूँ, मेरी सालों पुरानी मन्नत, उस गाड़ी से उतर कर मेरे पास आ खड़ी हुई। मेरे सामने खड़ी थी "जय परदा"। काटो तो खून नहीं, जीभ चिपक गयी तालू से। मुझसे उसने हाथ मिलाया, बात करी, और मैं सुन्न उसको एकटक निहारता रहा। इस कायनात ने अपनी साज़िश कर दी थी।।।।

मौलिक रचना
@विकास राजौरा

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